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ऐसा गांव जहां पानी जहर बनकर लोगों की जिंदगियों को निगल रहा है

इस गांव का पानी है जहर,फिर भी पी रहे है लोग

छत्तीसगढ़: जल ही जीवन है, ये वाक्य ये बताने के लिए काफी है, कि हमारे जीवन में पानी का महत्व क्या है. लेकिन जब यही पानी जीवन को निखारने की बजाए जीवन को निगलने वाला जहर बन जाए तो मानव जीवन अपंगता और रोगों का गोदाम बन जाता है. जहर में तब्दील हुआ पानी कई पिढ़ियों के जीवन को नष्ट कर देता है. ये महज कहानी भर नहीं है. हां उनके लिए ये सिर्फ कहानी हो सकती है. जिन्हें अभी आसानी से पीने को पानी मिल जा रहा होगा. लेकिन ये कहानी नहीं हकीकत है.

हमारे देश में एक राज्य है. छत्तीसगढ़. हां वही छत्तीसगढ़ जहां के नक्सलियों की खबरें आए दिन आपकों अखबारों और टीवी पर दिख जाती हैं. उसी छत्तीसगढ़ में एक जिला है बीजापुर और वहां से करीब 60 किलोमीटर दूर भोपालपट्नम में एक गांव है गेरागुड़ा. जहां 25 साल के उम्र के जवान लाठी के सहारे चलने को मजबूर हो जाते हैं और 40 वर्ष आते आते प्रकृतिक के नियम के विपरीत बूढ़े होने लग जाते हैं. इस गांव के 40 फीसदी लोग उम्र से पहले बूढ़े हो जाते हैं या फिर लाठी लेकर चलने लग जाते हैं. जिसका एकमात्र कारण है यहां के भूगर्भ में ठहरा पानी. जो अब यहां रह रहे इंसानो के लिए जहर बन चुका है. यहां के हैंडपंपों और कुओं से निकलने वाले पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण ये पूरा गांव ही समय से पहले ही अपंगता और मौत के भंवर में रोज समाता जा रहा है.

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प्रशासन शुद्ध पेयजल की व्यवस्था करने में हर जगह की तरह यहां भी असफल ही रहा है. सरकारों के विकास के दावों से अखबार पटे हैं और बंद बोतल पानी से नेताओं के कार्यालय. कुछ साल पहले प्रशासन ने कहा था की वो इस समस्या का हल निकालेंगे. लेकिन मौत की ओर बढ़ रहे इस गांव और ग्रामीणों की खबर फिलहाल कई वर्षों से प्रशासन ने नहीं ली है. कोई योजना बनाना तो बहुत दूर की बात है. गेरागुड़ा गांव में आठ से 40 साल तक का हर तीसरा व्यक्ति कुबड़पन, दांतो में सड़न, पीलापन और समय से पहले बुढ़ापे का शिकार है. विडंबना देखिए कि लोगों का कहना है की प्रशासन ने सड़क तो बना दी पर पानी से बर्बाद हो रही हमारी जिंदगीयों पर उसकी नजर अब तक नहीं पड़ी है. अब हर व्यक्ति शहर से खरीदकर पानी तो ला नहीं सकता. मजबुरन उसे यही फ्लोराइड युक्त जहरीले पानी का इस्तेमाल करना पड़ता है. गर्मी में ये समस्या और भी भयावह रुप ले लेती है. जब लोगों को 3 किलोमीटर पैदल चलकर इंद्रावती नदी से पानी लाना पड़ता है. जिसे उबालकर वो पीते हैं. ग्रामीणों के मुताबिक ये समस्या करीब 30 साल पुरानी है. जबतक लोग कुओं से पानी निकालकर इस्तेमाल किया करते थे. तब ये समस्या इतनी बड़ी नहीं थी. लेकिन जब से नलकुपों का खनन किया जाने लगा. तबसे से समस्या विकराल रुप धारण करने लगी और से आज पूरे गांव को मौत के मुंह में निगले जा रही है.

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विशेषज्ञों का मानना है की एक पीपीएम तक पानी में फ्लोराइड की मौजुदगी इस्तेमाल करने लायक होती है. लेकिन डेढ़ पीपीएम से अधिक फ्लोराइड की मात्रा खतरनाक मानी जाती है. जबकी गेरागुड़ा गांव के पानी में फ्लोराइड की मौजूदगी की मात्रा दो पीपीएम तक बताई जा रही है. हांलाकि प्रशासन ने कुछ साल पहले सप्लाई के लिए पानी की टंकी का निर्माण कराया था. लेकिन वो भी प्रशासन की लापरवाही की भेंट चढ़ गई.

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