राजनीति

वो मुद्दा जिसे गढ़ आडवाणी ने बीजेपी को सत्ता का स्वाद चखा दिया

लाल कृष्ण आडवाणी का समय अब बीजेपी से आधिकारिक रुप से समाप्त हो गया. आडवाणी के साथ अमित शाह की बीजेपी ने जो किया है. ये हमारे देश की संस्कृती में पितृपुरुषों का ढ़लता हुआ वक्त ऐसा ही होता है. खुद के खून पसीने से सींची और तराशी गई इमारत से उसे एक दिन बाहर होना पड़ता है. फिर वो घर की देहरी पर बैठकर मरते दम तक अपने बनाए घर को निहारते रहता है. जिसके ईट उसने भूखे रहकर जोड़े थें. आडवाणी को अब उसी देहरी पर बैठा दिया गया है.

भारतीय जनता पार्टी आज जिस शिखर को छू रही है. उसे वहां तक ले जाने में लाखों कार्यकर्ताओं की जी तोड़ मेहनत शामिल है. लेकिन कार्यकर्ताओं की उर्जा का सही उपयोग और उनका नेतृत्व किया दो नामों ने अटल बिहारी वाजपेई और भाजपा के ‘आयरन मैन’ कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी ने.

Image Source: news18

 

चुनाव का एलान हो चुका है. इस बार का चुनाव भी राम मंदिर विवाद के इर्द गिर्द ही चक्कर काट रहा है. हालांकी अदालत ने मामले के सुलझाने के लिए मध्यस्थों की टीम का गठन कर दिया है. लेकिन इससे पहले भी वीपी सिंह के सरकार में इस विवाद को मध्यस्थों के जरिए सुलझाने की कोशिस हुई थी. तब बीजेपी में आज के मोदी शाह की जोड़ी की तरह तब अटल आडवाणी की जोड़ी का जलवा पूरे देश में था. 91 साल के आडवाणी को पीएम इन वेटिंग कहा जाता है. लेकिन आज से करीब 30 साल पहले वो आडवाणी ही थे जिन्होनें अयोध्या राम मंदिर विवाद को पूरे देश के साथ बीजेपी के लिए भी एक चुनावी मुद्दा गढ़ दिया था. जो आज भी बीजेपी के लिए चुनावों में दुधारु गाय की तरह काम करता है.

जाहिर है आज की बीजेपी से आडवाणी का तालमेल ठीक नहीं है. वरिष्ठ पत्रकार बिजय त्रिवेदी कहते हैं कि एक वक्त हुआ करता था जब आडवाणी संसद में सदन से निकलकर अपने कमरे की ओर बढ़ते तो दर्जनों नेता उनके आगे पीछे होते थें. उन दिनों उनकी पार्टी और सरकार में तूंती बोलती थी. लेकिन अब बीजेपी के शिर्ष के नेता भी उनसे मिलने से बचते हैं. पिछले दिनों एक सत्र की रिपोर्टिंग के लिए संसद गया था तो देखा की आडवाणी सदन से अकेले ही बाहर निकल रहे हैं.

कराची में जन्में आडवाणी अपने शुरुआती दिनों में जनसंघ में वाजपेयी के सहायक के रुप में उनका राजनीतिक काम देखा करते थे.आपातकाल के बाद 1977 में जनता पार्टी के सरकार में वो सूचना एंव प्रसारण मंत्री बने. बाद में अटल और मुरली मनोहर जोशी के साथ भारतीय जनता पार्टी का गठन किया. आडवाणी के सियासी  सफर में गांधीनगर का अहम योगदान है. आडवाणी लगातार छह बार यहां से जीतकर संसद पहुंचते रहे हैं. इससे पहले वो 1970 से लेकर 1989 तक राज्यसभा के रास्ते सांसद चुने जाते रहे. 1989 में नौंवी लोकसभा का चुनाव उन्होंने पहली बार नई दिल्ली से लड़ा और जीतकर लोकसभा में पहुंचे. 1991 में गांधीनगर से पहली बार आम चुनाव लड़ा. फिर 1999 के बाद से अबतक वो गांधीनगर से चुनकर ही संसद पहुंचते रहे हैं. जैन हवाला कांड में नाम आने की वजह से आडवाणी ने 1996 का चुनाव नहीं लड़ा था.

विजय त्रिवेदी ने अपनी किताब यदा यदा ही योगी के मुताबिक. लंबे समय से बीजेपी के महासचिव और आडवाणी के करीबी रहे गोविंदाचार्या की बात माने तो राम मंदिर का मुद्दा वीपी सिंह की सरकार के कार्यकाल में सुलझ गया होता. वीपी सिंह ने इसके लिए एक प्रस्ताव रखा था कि एस मुद्दे से राजनीतिक दल खुद को दूर रखें और दोनो समुदायों के लोग गैर राजनीतिक लोगों के साथ मिलकर सका हल निकालने की कोशिश करें. वीपी सिंह का प्रस्ताव था कि विवादित ढांचा और स्थान एक नए हिंदु ट्रस्ट को दे दिया जाए. ताकि वह विवादित ढांचें में बिना किसी छेड़छाड़ के  राम मंदिर का निर्माण कराए और विवादित ढांचें के बीच एक दीवार बनाई जाए. वीपी सिंह ने तब इसकी जिम्मेदारी आन्ध्रप्रदेश के राज्यपाल कृष्णाकांत को सौंपी थी कि वो इस प्रस्ताव के लिए समर्थन जुटाएं. कृष्णकांत ने तब कांची कामकोटी पीठ के स्वामी जयेन्द्र सरस्वती को नए ट्रस्ट का मुखिया बनाने का सुझाव दिया था. साथ ही उन्होनें स्वामी जयेन्द्र और मंदिर विवाद के मुख्य याचिकाकर्ता अली मियां की आपस में मुलाकात भी कराई थी.

दूसरी तरफ पीएम ने संघ समर्थक एस.गुरुमुर्ती को इस बातचीत का मध्यस्थ बनाया था. गुरुमुर्ती ने तीन सुत्री फ़ॉर्मूला इजाद किया. इसके बाद वो प्रधानमंत्री के दूत के तौर पर वरिष्ठ मंत्री जार्ज फर्नाडिंस और पी. उपेंदर् से दिल्ली में मुलाकत कर बताया कि सरकार राम मंदिर विवाद पर अध्यादेश लाने को तैयार है. सरकार के अध्यादेश तैयार करने के बाद एक बैठक हुई और फिर सब कुछ उलझ गया. दरअसल अध्यादेश में सरकार ने यह शर्त रखी कि राममंदिर के एवज में विश्व हिंदु परिषद को काशी और मथुरा के मंदिर विवाद को त्याग देना पड़ेगा. मुस्लीम पक्ष मंदिर निर्णाण के लिए तैयार हो गया था लेकिन बाद में विश्व हिंदु परिषद ने अपने कदम वापस खींच लिए थे और नारा बुलंदी के साथ गूंज उठा था. अयोध्या तो झांकी है, काशी मथुरा बाकी है.
आडवाणी की रथ यात्रा 25 सितंबर को सोमनाथ से शुरु होकर 30 अक्टूबर को अयोध्या में खत्म होने वाली थी. जैसै जैसे रथयात्रा आगे बढने लगी. जनता दल की सरकार और बीजेपी के बीच खटास भी बढ़ने लगी. हालात आडवाणी के गिरफ्तारी तक पहुंचने लगे और अतंत बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी को लालू यादव के आदेश पर गिरफ्तार कर लिया गया. वो अलग बात है कि वीपी सिंह चाहते थे कि आडवाणी के गिरफ्तारी का श्रेय किसी भी कीमत पर तब के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव के हाथ नहीं लग सके.
कुल मिलाकर 90 के दशक में आडवाणी ने राम मंदिर आंदोलन के जरिए भाजपा को पूरे देश में पहचान दिलाई थी. फिर यहीं से भाजपा मजबूती के साथ उभरी और आज देश पर शासन कर रही है. लेकिन आडवाणी इस सत्ता के सुख से बहुत दूर रह गए हैं.
तब से आडवाणी का गढ़ा हुआ राम मंदिर विवाद का चुनावी मुद्दा जब जब बीजेपी की सरकार बनी तब तब अहम साबित हुआ. अपने ओजस्वी भाषणों से लोगों को लामबंद कर देने वाले आडवाणी को आज एकांत ने अपने ओर लामबंद कर लिया है. बीजेपी को दो सीटों से 282 तक पहुंचाने में आडवाणी ने अपनी पूरी उम्र खपा दी. आज जिस पीएम मोदी की वजह से आडवाणी अपनी पार्टी से किनारे कर दिए गए हैं. गुजरात दंगों के बाद इसी मोदी के लिए वो  वाजपेयी से भीड़ गए थे. जब वो नरेंद्र मोदी को गुजरात के सीएम पद से हटाना चाहते थे. देश कुछ भी कहे उनकी पार्टी उन्हें माने या ना माने लेकिन आडवाणी आज भी इस देश की राजनीतिक धरोहर हैं. उनके भीतर इस देश की राजनीति के तमाम अनकही बातें सिमटी हैं. मेरी उनसे यही गुजारिश है कि वो  इन्हें जनता के बीच जरुर लाएं. खुब किताबें लिखें. ताकी मेरे जैसे राजनीति के छात्र और भी उन्हें पढ़कर अपने खजाने को और मजबूत कर सके.

टैग

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

संबंधित समाचार

Back to top button
Close
Close